उसे तोड़ खुश होता क्यूँ है
जो आता है जाता क्यूँ है ?
और बेबस इतने पाता क्यूँ हैं ?
सज़ा मिले सत्कर्मों की
यह सोच हमें सताता क्यूँ है ?
सच्चाई की राह कठिन है
उसपर चलकर रोता क्यूँ है ?
है राग वही रागनी भी वही
फिर गीत नया भाता क्यूँ है ?
ममता तो अनमोल है फिर
वंचित उससे रहता क्यूँ है ?
माली सींचे जिस सुमन को
उसे तोड़ खुश होता क्यूँ है ?
प्यार कुसुम सच्चा जो कहो
प्रतिबन्ध लगाता क्यूँ है ?
–कुसुम ठाकुर
संपादक, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता
झारखंड, भारत